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Sunday, 6 January 2019

मैथली शरण गुप्त / जीवन परिचय

January 06, 2019


मैथली शरण गुप्त / जीवन परिचय




जन्म स्थानचिरगाँव, जिला झाँसी ( उत्तर प्रदेश )        
जन्म एवं मृत्यु दिनांक – 1886 ई० – 1964 ई०
पिता – सेठ रामचरण गुप्त                               माता – काशीबाई गुप्त  
भाषा -  खड़ीबोली                                      शैली – प्रबंधात्मक, उपदेशात्मक 

जीवन परिचयराष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त का जन्म सन 1886 ई० में चिरगाँव जिला झाँसी में हुआ था l उनके पिता सेठ राम चरण गुप्त भगवान की भक्ति और आध्यात्मिकता में सबसे अधिक समय लेते थे, उनकी इस पितृ प्रकृति की भक्ति का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा था, उनके पिता कविता के क्षेत्र में अग्रणी थे l इन्होने कक्षा 9 तक ही विद्यालयीय शिक्षा प्राप्त की थी, किन्तु स्वाध्याय से अनेक भाषाओँ के साहित्य का ज्ञान प्राप्त किया l महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के बाद उनको अपना काव्य गुरु मानने लगे l द्विवेदी जी के आदेश पर गुप्तजी ने सर्वप्रथम ‘भारत भारती’ नामक ग्रन्थ की रचना की और युवाओं में देश प्रेम की सरिता बहा दी l इन्होने गाँधी जी के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में भी भाग लिया l राष्ट्रिय विषयों पर लिखने के कारण ये राष्ट्रीय कवि कहलाए l सन 1948 में आगरा विश्वविद्यालय और 1958 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने डी० लिट की मानक उपाधि से सम्मानित किया l सन 1954 में भारत सरकार ने पद्मभूषण की उपाधि से इन्हें अलंकृत किया l दो बार ये राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत हुए l इनका देहावसान 12 दिसम्बर, सन 1964 को हुआ l

साहित्यिक परिचय – गुप्तजी की प्रारम्भिक रचनाएँ कलकत्ता से प्रकाशित पत्रिका ‘वैश्योपकारक’ में प्रकाशित होती थीं l द्विवेदी जी के सम्पर्क में आने के बाद इनकी रचनाएँ ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होने लगी l सन 1909 में इनकी सर्वप्रथम पुस्तक ‘रंग में भंग’ का प्रकाशन हुआ l इसके बाद सन 1912 में ‘भारत भारती’ के प्रकाशित होने से इन्हें अपार ख्याति मिली l ‘साकेत’ नामक महाकाव्य पर हिंदी साहित्य सम्मलेन ने इन्हें ‘मंगला प्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया l खड़ीबोली के स्वरुप निर्धारण और उसके विकास में इन्होने अपना अमूल्य योगदान दिया l


रचनाएँ – गुप्तजी आधुनिक काल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे l इनकी 40 मौलिक तथा 6 अनूदित पुस्तके प्रकाशित हुई हैं l इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ इस प्रकार हैं – ‘भारत भारती’, ‘यशोधरा’, ‘साकेत’, ‘पंचवटी’ हैं l इसके अतिरिक्त ‘जयद्रथ वध’, ‘जय भारत’, ‘द्वापर’, ‘सिद्धराज’, ‘अनघ’, ‘झंकार’, ‘नहुष’, ‘पृथ्वीपुत्र’, ‘रंग में भंग’, ‘गुरुकुल’, ‘किसान’, ‘हिन्दू’, ‘चंद्रहास’, ‘मंगल घट’, ‘कुणाल गीत’, ‘तथा ‘मेघनाथ वध’ आदि महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं l


भाषा एवं शैली – गुप्त जी ने शुद्ध, साहित्यिक एवं परिमार्जित खड़ीबोली में रचनाएँ की हैं l इनकी भाषा सुगठित तथा ओज एवं प्रसाद गुण से युक्त है l इन्होने अपने काव्य में संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू एवं प्रचलित विदेशी शब्दों के भी उपयोग किए हैं l इनके द्वारा प्रयुक्त शैलियाँ हैं – प्रबंधात्मक शैली, उपदेशात्मक शैली, विवरणात्मक शैली, गीति शैली तथा नाट्य शैली l वस्तुतः आधुनिक युग में प्रचलित अधिकांश शैलियों को गुप्त जी ने अपनाया है l  



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Tuesday, 18 December 2018

हरिवंश राय बच्चन / जीवन परिचय /मधुशाला /

December 18, 2018

हरिवंशराय बच्चन / जीवन परिचय 




जन्म स्थान – प्रयाग ( उत्तर प्रदेश )
जन्म एवं मृत्यु दिनांक – 27 नवम्बर, 1907 ई० - 18 जनवरी, 2003 ई०
पिता – प्रताप नारायण                               माता - तेजी देवी
भाषा – खड़ीबोली                                    शैली – भावात्मक गीत शैली 


जीवन परिचय – हरिवंशराय बच्चन का जन्म प्रयाग में मार्गशीर्ष कृष्ण 7, संवत् 1964 वि० ( 27 नवम्बर, 1907 ई० ) में हुआ l इन्होने काशी और प्रयाग में शिक्षा प्राप्त की l कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इन्होने डॉक्टरेट की l कुछ समय ये प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे और फिर दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय में कार्य किया और वहीँ से अवकाश ग्रहण किया l
बच्चन उत्तर छायावादी काल के आस्थावादी कवि थे l इनकी कविताओं में मानवीय भावनाओं की सामान्य एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुई है l सरलता, संगीतात्मक, प्रवाह, और मार्मिकता इनके काव्य की विशेषता हैं और इसी से इन्हें इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई l 18 जनवरी, सन 2003 ई० में बच्चन जी का निधन हो गया l

साहित्यिक परिचय - पहली पत्नी के मृत्यु के बाद विषाद और निराशा ने इनके जीवन को घोर लिया l इनके स्वर हमको ‘निशा – निमंत्रण’ और ‘एकांत संगीत’ में सुनने को मिलता हैं l इसी समय से इनके ह्रदय की गंभीर वृत्तियों का विश्लेषण आरम्भ हुआ, किन्तु सतरंगिनी में फिर नीड़ का निर्मद किया गया और जीवन का प्याला एक बार फिर उल्लास और आनन्द के आसव से छलकने लगा l बच्चन वास्तव में व्यक्तिवादी कवि रहे हैं l ‘बंगाल का काल’ तथा इसी प्रकार की अन्य रचनाओं में इन्होने अपने जीवन के बाहर विस्तृत जनजीवन पर भी दृष्टि डालने का प्रयत्न किया l इन परवर्ती रचनाओं में कुछ नवीन विषय भी उठाए गए l इनमे कवि की विचारशीलता तथा चिंतन की प्रधानता रही l वास्तव में इनकी कविताओं में राष्ट्रिय उद्गारों, व्यवस्था में व्यक्ति की असहायता और बेबसी के चित्र दिखाई पड़ते हैं l

रचनाएँ – आरम्भ में बच्चन जी उमर खैयाम के जीवन दर्शन से बहुत प्रभावित रहे l इसी ने इनके जीवन को मस्ती से भर दिया l इनकी काव्य कृतियों में –‘मधुशाला’, ‘निशा निमंत्रण’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘मधुकलश’, ‘मिलन यामिनी’, ‘त्रिभंगिमा’. ‘आरती और अंगारे’, ‘एकांत संगीत’, ‘सतरंगिनी’, ‘बुद्ध का नाचघर’ और ‘जाल समेटा’ l मधुशाला, मधुबाला, हाला और प्याला को इन्होने प्रतीकों के रूप में स्वीकार किया l 

भाषा एवं शैली – परवर्ती रचनाओं में कवि की वह भावावेशपूर्ण तन्मयता नहीं है, जो उसकी आरंभिक रचनाओं में पाठकों और श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करती रही l इन्होने सरस खड़ीबोली का प्रयोग किया है l शैली भावात्मक गीत शैली है, जिसमे लाक्षणिकता और संगीतात्मकता है l 

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महादेवी वर्मा / जीवन परिचय

December 18, 2018

महादेवी वर्मा / जीवन परिचय 




जन्म स्थान – फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश )        जन्म एवं मृत्यु सन 1907 ई० – 1987 ई० l
पिता – गोविन्दप्रसाद वर्मा l                  माता – श्रीमती हेमरानी देवी l
भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली l               शैली – विवेचनात्मक, संस्मरणात्मक, भावात्मक,                                                    व्यंग्यात्मक, चित्रात्मक, अलंकारिक l


जीवन परिचय महादेवी वर्मा ‘पीड़ा की गायिका’ के रूप में सुप्रसिद्ध छायावादी कवियित्री होने के साथ एक उत्कृष्ट लेखिका भी थी l गुलाबराय जैसे शीर्ष स्तरीय गद्यकार ने लिखा है –‘मैं गद्य में महादेवी का लोहा मानता हूँ l’ महादेवी वर्मा जी का जन्म फर्रुख्बाद के एक संपन्न कायस्थ परिवार में सन 1907 ई० में हुआ था l इंदौर में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इन्होने क्रास्थवेट गर्ल्स कालेज, इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की l इंका विवाह स्वरुप नारायण वर्मा से ग्यारह वर्ष की अल्प आयु में ही हो गया था l श्वसुर जी के विरोध के कारण इनकी शिक्षा में व्यवधान आ गया, परन्तु उनके निधन के पश्चात् इन्होने पुनः अध्ययन आरंभ किया और प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत विषय में एम० ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की l वे 1965 ई० तक प्रयाग महिला विद्या पीठ की प्रधानाचार्य के रूप में कार्यरत रही l इन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद् की सदस्य भी मनोनीत किया गया l इनका देहावसान 11 सितम्बर, 1987 ई० को प्रयाग में हुआ l 

साहित्यिक परिचय महादेवी वर्मा के गद्य आरंभिक रूप इनकी काव्य कृतियों की भूमिकाओं में देखने को मिलता है l ये मुख्यतः कवियित्री ही थी, फिर भी गद्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कोटि के संस्मरण, रेखाचित्र, निबन्ध, एवं आलोचनाएँ लिखीं l रहस्यवाद एवं प्रकृतिवाद पर आधारित इनका साहित्य; हिंदी साहित्य की अमूल्य विरासत के रूप में स्वीकार किया जाता है l विरह की गायिका के रूप में महादेवी जी को ‘आधुनिक मीरा’ कहा जाता है l महादेवी जी के कुशल संपादन के परिणाम स्वरुप ही ‘चाँद’ पत्रिका नारी जगत की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका बन सकी l इन्होने साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु ‘साहित्यकार संसद’ नामक संस्था की स्थापना की l इन्हें ‘नीरजा’ काव्य रचना पर ‘सेकसरिया’ पुरस्कार और ‘यामा’ कविता संग्रह पर ‘मंगलाप्रसाद’ पारितोषिक से सम्मानित किया गया l कुमांऊ विश्वविद्यालय ने इन्हें डी० लिट० की मानक उपाधि से विभूषित किया l भारत सरकार से ‘पद्मविभूषण’ भी इन्हें प्राप्त हुआ था लेकिन हिंदी के प्रचार प्रसार के प्रति सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति से व्यथित होकर महादेवी जी ने इस अलंकरण को वापस कर दिया l ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार इन्हें 1983 में दिया गया था l 

रचनाएँ – महादेवी वर्मा की प्रमुख कृतियाँ अग्रलिखित हैं – 

निबन्ध – संग्रह – ‘अबला और सबला’, ‘साहित्यकार की आस्था’, ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘क्षणदा’ आदि l इन निबन्ध संग्रहों में इनके साहित्यिक तथा विचारात्मक निबन्ध संगृहित हैं l

संस्मरण और रेखाचित्र – ‘पथ के साथी’, ‘मेरा परिवार’, ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘अतीत के चलचित्र’ आदि l इनमे इनके ममतामई ह्रदय के दर्शन होते हैं l इनमे गद्य चित्रात्मक, कवित्वपूर्ण एवं भावात्मक है l 

संपादन – ‘आधुनिक कवि’ नामक काव्य संग्रह और ‘चाँद’ पत्रिका का विद्वत्ता के साथ संपादन कार्य किया l

आलोचना – ‘हिन्दी का विवेचनात्मक गद्य’ तथा ‘यामा’ और दीपशिखा’ की भूमिकाएँ l

काव्य रचनाएँ – ‘रश्मि’, ‘यामा’, ‘दीपशिखा’, ‘नीरजा’, ‘निहार’, और ‘सांध्यगीत’ आदि l

भाषा शैली – महादेवी जी की काव्य भाषा अत्यंत उत्कृष्ट, समर्थ एवं सशक्त है l संस्कृतनिष्ठता इनकी भाषा की प्रमुख विशेषता है l इनकी रचनाओं में उर्दू और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग भी हुआ है l मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी इनकी रचनाओं में हुआ है जिससे इनकी भाषा में लोक जीवन की जीवन्तता का समावेश हो गया है l लक्षणा एवं व्यंजना की प्रधानता इनकी भाषा की महत्वपूर्ण विशेषता है l इस प्रकार महादेवी जी की भाषा शुद्ध साहित्यिक भाषा है l इनकी रचनाओं में चित्रोत्मक वर्णनात्मक शैली, विवेचनात्मक शैली, व्यंग्यात्मक शैली, अलंकारिक शैली, सूक्ति शैली, उद्धरण शैली आदि दिखाई देते है l  


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Wednesday, 12 December 2018

हरिवंश राय बच्चन / मधुशाला / हरिवंशराय बच्चन

December 12, 2018

              मधुशाला / हरिवंश राय 'बच्चन'

हरिवंश राय 'बच्चन'

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मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।

मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।

Monday, 10 December 2018

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December 10, 2018

                            

 गिल्लू / महादेवी वर्मा 

गिल्लू / महादेवी वर्मा
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      सोनजुही में आज एक पीली कलि लगी है l उसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण आया, जो इस लता कि सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था l तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राणी की खोज है l
     
     परन्तु वह तो अब तक सोनजुही की जड़ में मिट्टी होकर मिल गया होगा कौन जाने स्वर्णिम कली के बहाने वही मुझे चौंकाने ऊपर आ गया हो l
     
     अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छुवा – छुवौवल जैसा खेल रहे हैं l यह कागभुशुण्डी भी विचित्र पक्षी है – एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित l
    
     हमारे बेचारे पुरखे न गरुण के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के न हंस के l उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है l इतना ही नहीं, हमारे दूरस्थ प्रियजनों को भी अपने आने का मधु सन्देश इनके कर्कस स्वर ही में देना पड़ता है l दूसरी ओर हम कौवा और काँव काँव करने को अवमानना के अर्थ में ही प्रयुक्त करते हैं l

     मेरे काक्पुरण के विवेचन में अचानक बाधा आ पड़ी, क्योंकि गमले और दीवार की सन्धि में छिपे एक छोटे से जीव पर मेरी दृष्टि रूक गई l निकट जाकर देखा, गिलहरी का छोटा बच्चा है, जो संभवतः घोसले से गिर पड़ा है और अब कौवे जिसमे सुलभ आहार खोज रहे है l
   
     काकद्वय की चोंचों के दो घाव उस लघु प्राण के लिए बहुत थे l अतः वह निश्चेष्ट सा गमले में चिपटा पड़ा था l सबने कहा की कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद वह बच नहीं सकता, अतः इसे ऐसे ही रहने दिया जाए l परन्तु मन नहीं माना, उसे हौले से उठाकर अपने कमरे में ले आई, फिर रुई से रक्त पोंछकर घांवों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया l
     
     रुई की पतली बत्ती दूध में भिगोकर जैसे तैसे उसके नन्हे से मुँह में लगाई, पर मुँह खुल न सका और दूध की बूंदे दोनों ओर लुढ़क गई l

     कई घंटे के उपचार के उपरांत उसके मुंह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका l तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त हो गया की मेरी उंगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर, नीले कांच की मोतियों जैसी आँखों से इधर उधर देखने लगा l

     तीन चार माह में उसके स्निग्ध रोएँ, झब्बेदार पूंछ और चंचल चमकीली आँखे सबकी विस्मित करने लगी l

     हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे l मैंने फूल रखने की एक हल्की डलिया में रुई बिछाकर उसे तार से खिड़की पर लटका दिया l

   वही दो वर्ष गिल्लू का घर रहा l वह स्वयं हिलाकर अपने घर में झूलता और अपने कांच के मनकों सी आँखों से कमरे के भीतर और खिड़की से बाहर न जाने क्या देखता समझता रहता था, परन्तु उसकी समझदारी और कार्यकलाप पर सबको आश्चर्य होता था l
     
     जब मैं लिखने बैठती तब अपनी ओर मेरा ध्यान आकर्षित करने की उसे इतनी तीव्र इच्छा होती थी की उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला l

     वह मेरे पैर से आकर सर्र से परदे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेजी से उतरता l उसका यह दौड़ने का क्रम तब तक चलता, जब तक मैं उसे पकड़ने के लिए न उठती l

     कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लम्बे लिफाफे में इस प्रकार रख देती की अगले दो पंजों और सर के अतिरिक्त सारा लघु गात लिफाफे के अन्दर बंद रहता l इस अदभुत स्थिति में कभी कभी घण्टों मेज पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्यकलाप देखा करता l

     भूख लगने पर चिक चिक करके वह मुझे सूचना देता और काजू या बिस्कुट मिल जाने पर उसी स्थिति में लिफेफे से बाहर वाले पंजों से उसे कुतरता रहता l

     फिर गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया l नीम चमेली की गंध मेरे कमरे में हौले हौले आने लगी l बाहर गिलहरियाँ खिड़की की जाली के पास आकर चिक चिक करके न जाने क्या कहने लगी l

     गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झांकते देखकर मुझे लगा की इसे मुक्त करना आवश्यक है l

     मैंने कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मार्ग गिल्लू ने बाहर जाने पर सचमुच मुक्ती की सांस ली l इतने छोटे जीव को घर में पले कुत्ते और बिल्लियों से बचाना भी एक समस्या ही थी l

     आवश्यक कागज पत्रों के कारण बाहर जाने पर मेरा कमरा बंद ही रहता है l मेरे कालेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने भीतर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू जाली के द्वार से भीतर आकर मेरे पैर से सर और सर से पैर दौड़ लगाता l तब से यह नित्य का क्रम हो गया l

    मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी खिड़की की खुली जाली की राह बाहर चला जाता और दिन भर गिलहरियों के झुण्ड का नेता बना, हर दाल पर उछलता कूदता रहता और ठीक चार बजे वह खिड़की से भीतर आकार अपने झूले पर झूलने लगता l

    मुझे चौकाने की इच्छा उसमे न जाने कब और कैसे उत्पन्न हो गई थी l कभी फूलदान के फूलों में छिप जाता, कभी परदे की चुन्नट में और कभी सोनजुही की पत्तियों में l

     मेरे पास बहुत से पशु पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परन्तु उसमे से किसी को मेरे साथ मेरे थाली में खाने की हिम्मत हुई हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता l

     गिल्लु इसमे अपवाद था l मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँची, वह खिड़की से निकलकर आँगन के दीवार, बरामदा पार करके मेज पर पहुँच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता l बड़ी कठिनाई से उसे मैंने थाली के पास बैठना सिखाया, जहाँ बैठकर वह मेरी थाली में से एक एक चावल उठाकर बड़ी सफाई से खाता रहता l काजू उसका प्रिय खाद्य था और कई दिन काजू न मिलने पर वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता या तो झूले के निचे फेंक देता था l

     उसी बीच मुझे मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहन पड़ता l उन दिनों जब मेरे कमरे का दरवाजा खोला जाता, गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता और फिर किसी दूसरे को देखकर उसी तेजी से अपने घोसले में जा बैठता सब उसे काजू दे जाते, परन्तु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सफाई की तो उसमे काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात हुआ की वह उन दिनों अपना प्रिय खाद्य कम खाता था l

     मेरी अस्वस्थता में वह तकिये पर सिराहने बैठकर अपने नन्हे नन्हे पंजों से ये मेरे सर और बालों को इतने हौले हौले सहलाता की उसका हटना एक परिचारिका के हटने के समान था l

     गर्मियों में जब दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता, न अपने झूले में बैठता l उसने मेरे निकट रहने के साथ गर्मी से बचने का एक सर्वथा नया उपाय खोज निकाला था l वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार समीप भी रहता और ठण्डक में भी रहता l

     गिलहरियों के जीवन की अवधी दो वर्ष से अधिक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन के यात्रा का अंत आ ही चुका था l दिनभर उसने ने कुछ खाया और न ही बाहर गया l रात में अन्त की यातना में भी वह झूले से उतारकर मेरे बिस्तर पर आया और ठन्डे पंजों से मेरी वही ऊँगली पकड़कर हाँथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था l

     पंजे इतने ठन्डे हो रहे थे की मैंने जागकर हीटर जलाया और उसे उष्णता देने का प्रयत्न किया, परन्तु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया l  

     उसका झूला उतारकर रख दिया है और खिड़की की जाली बंद कर दी गई है, परन्तु गिलहरियों की नई पीढ़ी जाली के उस पार चिक चिक करती ही रहती है और सोनजुही पर बसंत आता ही रहता है l

     सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गई – इसलिए भी की उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी – इसलिए भी की लाघुपात का, किसी वासंती दिन, जूही के पिलाभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास मुझे सन्तोष देता है l           

Sunday, 9 December 2018

मैथिलीशरण गुप्त,गीत मैथिलीशरण गुप्त,गीत मैथिली शरण गुप्त,मैथिलीशरण गुप्त की कविता

December 09, 2018


 सरकस / मैथलीसरण गुप्त 

सरकस / मैथलीसरण गुप्त
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               होकर कौतूहल के बस में,
               गया एक दिन मैं सरकस में ,
               भय विस्मय के काम अनोखे
               देखे बहू व्यायाम अनोखे l

                         एक बड़ा सा बंदर आया,
                         उसनें झटपट लैम्प जलाया
                         डट कुर्सी पर पुस्तक खोली
                         आ तब तक मैना यूँ बोली;

               हाजिर है हुजूर का घोड़ा
               चौक उठाया उसने कोड़ा
               आया तब तक एक बछेड़ा
               चढ़ बंदर ने उसको फेरा

                         एक मनुज अंत में आया
                         पकड़े हुए सिंह को लाया
                         मनुज सिंह की देख लड़ाई
                         की मैनें इस भांति बड़ाई;

               कई साहसी जंग डरता है
               नर – नाहर को वस करता है
               मेरा एक मित्र तब बोला
               भाई तू भी है बस भोला

                         यह सिंघी का जना हुआ है
                         किन्तु सियार यह बना हुआ है
                         यह पिंजड़े में बंद रहा है
                         कभी नहीं स्वच्छंद रहा है

               छोटे से यह पकड़ा आया
               मार मार कर गया सिखाया
               अपने को भी भूल गया है
               आती इस पर मुझे दया है l

ब्रेन स्ट्रोक होने का पहचान एवं उपचार

December 09, 2018

ब्रेन स्ट्रोक होने का पहचान एवं उपचार


ब्रेन स्ट्रोक होने का पहचान एवं उपचार
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      स्ट्रोक या ब्रेन अटैक एक गंभीर समस्या है , विश्व में अब तक 8 करोड़ लोग स्ट्रोक से ग्रस्त हो चुके हैं l दुनिया में 5 करोड़ व्यक्ति स्ट्रोक के कारण दिव्यांगता से ग्रस्त हो जाते हैं l  लेकिन इससे निराश होने की आवश्यकता नही है l अगर स्ट्रोक के लिए कुछ सजकता बरती जाय , तो इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है l यही नहीं समय रहते इसका इलाज भी संभव है l

इन फलों को खाने के बाद रोग आपके आस – पास भी नहीं भटकेंगे...


 स्ट्रोक मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति में बाधा आने के कारण होता है l यह आम तौर पर तब होता है जब रक्त वाहिकाएँ ( ब्लड वेसेल्स ) फट जाती है या किसी थक्के के कारण अवरुद्ध हो जाती है l इससे मस्तिष्क को ऑक्सीजन एवं अन्य पोषक तत्वों की आपूर्ति में कमी आ जाती है , जिससे मस्तिष्क के टिश्यूज को नुकसान पहुँचता है l जब मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाएं मृत हो जाती हैं , तब शरीर के विभिन्न हिस्सों को नियंत्रित करने की उनकी कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचता है l बहरहाल , कुछ सजकताएं बरतकर स्ट्रोक के खतरे को कम किया जा सकता है l


ऐसे करें स्ट्रोक की पहचान

बिना किसी ज्ञात कारण के अचानक सर में बहुत तेज दर्द होना l
चेहरे, हांथों या पैरों में अचानक सुन्नपन या कमजोरी महसूस होना ( विशेष रूप से शरीर के एक    तरफ )
अचानक भ्रम होने लगना या बोलने में परशानी होना l
एक या दोनों आँखों से अचानक देखने में परेशानी होना l
चलने फिरने में अचानक परेशानी होने लगना l
चक्कर आना और शारीरिक संतुलन में दिक्कत होना l


स्ट्रोक के विभिन्न प्रकार एवं उनका उपचार

इस्कीमिक स्ट्रोक : यह स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क की धमनियां सकुंचित या उसमें कोई अवरुद्ध हो जाता है इस कारण मस्तिष्क में रक्त प्रवाह में गंभीर रूप से कमी आ जाती है l यह स्ट्रोक इस्कीमिक स्ट्रोक कहलाता है l
इलाज : इस्कीमिक स्ट्रोक का इलाज करने के लिए रोगी को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए l रोगी के अस्पताल आने के एक घंटे के अन्दर उसे क्लॉट को दूर करने वाली दवाएं दी जानी चाहिए l


हेमोरेजिक स्ट्रोक : यह स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क की रक्त वाहिनियाँ रिसने लगती हैं या फट जाती हैं l हेमोरेजिक स्ट्रोक मस्तिष्क के एन्जुरिज्म के फटने या कमजोर रक्त वाहनियों के रिसने के कारण होता है l रक्त मस्तिष्क में या इसके चारो ओर फैल जाता है और मस्तिष्क में सूजन और दबाव पैदा करता है l यह स्ट्रोक मस्तिष्क की कोशिकाओं और टिश्यूज को हानि पहुंचता है l
इलाज : हेमोरेजिक स्ट्रोक को रोकने या मस्तिष्क में रक्त फैलाव को रोकने के लिए सर्जरी की जाती है l
इन्जुरिम क्या होता है ?

इन्जुरिम मस्तिष्क की एक खतरनाक बीमारी है , जिसमें रक्त की नली में गुब्बारे जैसी संरचना बन जाती है l इन्जुरिम का पता दिमाक में स्ट्रोक के बाद ही पता चलता है l यह एक गंभीर चिकत्सकीय स्थिति है l इनके फटने पर दिमाक में काफी क्षति हो सकती है और यह मृत्यु का कारण बन सकता है l
इन्जुरिम का उपचार : इस समस्या का इलाज मस्तिष्क में क्लिपिंग और क्वाईलिंग की प्रक्रियाओं से होता है l

क्लिपिंग : क्लिपिंग के अंतर्गत न्यूरो सर्जन के द्वारा पारंपरिक रूप से की जाने वाली ‘ओपन क्लिपिंग’ में स्कल या खोपड़ी को खोलकर इन्जुरिम में क्लिप लगा दिया जाता है , यह क्लिप इन्जुरिम में रक्त प्रवाह को रोकता है , जो इसे फटने से रोकता है l

क्वाइलिंग : इसके तहत एक कैथेटर के माध्यम से इन्जुरिम में प्लेटिनम क्वायल को खोपड़ी खोले बगैर रखा जाता है l

फ्लो डायवर्टर्स : यह इन्जुरिम के इलाज का उपलब्ध सबसे नवीनतम उपाय है l ऐसे डिवाइस स्टेंट के समान होते हैं , लेकिन इन्हें मजबूती से तैयार किया जाता है और इस तरह इनके मेस ( तार से बनी हुई एक जाली ) के छेद पारंपरिक स्टेंट की तुलना में अधिक छोटे होते हैं l इनकी संरचना इस प्रकार की होती है कि ये इन्जुरिम के गुब्बारे में रक्त प्रवाह को जाने नहीं देते l परिणाम स्वरूप इन्जुरिम स्वयं ख़त्म हो जाता है l


ऐसे करें स्ट्रोक से बचाव
अगर हाई ब्लडप्रेसर है, तो डॉक्टर से परामर्स लेकर उसे नियंत्रित रखें l ब्लड प्रेसर को नियंत्रित     करने के लिए नियमित रूप से दवाएं लें l
ह्रदय रोगों के कारण भी स्ट्रोक का जोखिम बढ़ जाता है l इस लिए जो लोग कोरोनरी आर्टरी या   अन्य ह्रदय रोगों से ग्रस्त हैं, उन्हें अपने डॉक्टर से परामर्स एवं नियमित दवाएं लेनी चाहिए l
मोटापे से मुक्त रहें l इसके लिए समुचित खान-पान और नियमित रूप से व्यायाम करें l
डॉक्टर से परामर्स लेकर डायबिटीज वाले व्यक्ति अपनी ब्लड शुगर को नियंत्रित रखें l
रक्त में कोलेस्ट्रोल का स्तर नियंत्रित रखें l इसके लिए डॉक्टर के परामर्स से एक निश्चित अंतराल कोलेस्ट्रोल से सम्बंधित जाँच करें l

इन फलों को खाने के बाद रोग आपके आस – पास भी नहीं भटकेंगे...