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Wednesday, 28 November 2018

दीपदान / डॉ रामकुमार वर्मा


                           दीपदान / डॉ रामकुमार वर्मा 

दीपदान / डॉ रामकुमार वर्मा

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दीपदान डॉ रामकुमार वर्मा का एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक एकांकी है l इस एकांकी में वर्मा जी ने बलिदान और त्याग की मूर्ति पन्ना धाय की ऐतिहासिक गौरव गाथा का चित्रण किया है l संक्षेप में यह इस प्रकार है –

             
                चित्तौडगढ के महाराजा राणा सांगा संग्रामसिंह के निधन के पश्चात् उनके अनुज पृथ्वीराज का दासी पुत्र बनवीर ( आयु 32 वर्ष ) चित्तौड़ का राजा बनकर राज्य करना चाहता था l कुल परम्परा के अनुसार संग्रामसिंह के पुत्र कुंवर उदय सिंह ( आयु 14 वर्ष ) को राज्य मिलना चाहिए था किन्तु, उदयसिंह अल्पवयस्क होने के कारण उसका उत्तराधिकारी नहीं था l अतः उदयसिंह के संरक्षक के रूप में बनवीर को चित्तौडगढ की गद्दी सौंप दी गई l दीपदान उत्सव के बहाने वह कुंवर उदयसिंह की हत्या का षड्यन्त्र रचता है l कुंवर उदय सिंह का पालन पोषण करने वाली पन्नाधाय ( आयु 30 वर्ष ) चित्तौड़ के राजमहल में बैठी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी l उदयसिंह तुलजा भवानी के मन्दिर से लड़कियों के नृत्य को देखकर आ जाता है और पन्ना धाय को लेकर फिर जाना चाहता है l अनहोनी की आशंका से पन्ना धाय उसे पुनः वहाँ नहीं जाने देती l कुंवर उदयसिंह रूठकर शयन कक्ष को छोड़कर दूसरे कक्ष में सोने चले जाते है l कुछ समय पश्चात् रावल रूपसिंह की पुत्री सोना ( आयु 16 वर्ष ) जो कुंवर के साथ खेलती है, कुंवर को अपने साथ ले जाने के लिए पन्ना के पास आती है l सोना को बनवीर ने उदयसिंह को साथ लेन के लिए भेजा था l पन्ना बनवीर के इस षड़यंत्र को भांप लेती है और सोना से टाल मटोल कर देती है l

पढ़िए जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कहानी ममता / जयशंकर प्रसाद


                कुछ ही क्षण के पश्चात् कुंवर को ढूढ़ता हुआ पन्ना का पुत्र चन्दन ( आयु 13 वर्ष ) आता है l उदयसिंह के सो जाने की बात सुनकर वह चला जाता है l उसी समय सामली ( आयु 28 वर्ष ) नाम की दासी चीखती हुई पन्ना के पास आकर बताती है की बनवीर ने सोते हुए विक्रमादित्य की हत्या कर दी है और अब वह इधर ही कुंवर की हत्या के लिए आ रहा है l दासी की बात सुनकर पन्ना व्याकुल हो गई और कुंवर की रक्षा का उपाय सोचने लगी l कुंवर को लेकर पन्ना कुम्भलगढ़ भाग जाना चाहती थी लेकिन राज महल को बनवीर के सैनिकों ने चारों तरफ से घेर लिया है l संयोगवश महल का जूठन उठाने वाला कीरत बारी ( आयु 40 वर्ष ) एक बड़ी टोकरी लेकर वहां आ जाता है l पन्ना दृढ़तापूर्वक उसे सारी बातें बताती है l स्वामीभक्त कीरत बारी पन्ना की योजनानुसार उदयसिंह को टोकरी में लिटाकर बाहर लेकर चला गया l अब पन्ना सोचती है की बनवीर को कुंवर के विषय में क्या बताएगी l अंततः वह सोंचती है की कुंवर उदयसिंह की शय्या पर चादर उढ़ाकर अपने पुत्र चन्दन को लिटा देगी l उसी समय चन्दन वहां आ जाता है l पन्ना ने उसे कुंवर की शय्या पर लिटाकर, लोरी गाते हुए सुला देती है l इस प्रकार उदयसिंह की रक्षा के लिए पन्ना अपने पुत्र के बलिदान के लिए तत्पर हो जाती है l


               उसी समय बनवीर हाँथ में नंगी तलवार लिए उदयसिंह के कक्ष में प्रवेश करता है l वह जागीर का प्रलोभन देकर पन्ना को अपने षड़यंत्र में सहायक बनाना चाहता है, किन्तु पन्ना अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहती है l वह बनवीर को फटकारती है l क्रोधित बनवीर चन्दन को कुंवर उदयसिंह समझकर पन्ना की आँखों के सामने ही तलवार से मौत के घट उतार देता है l वह क्रूरतापूर्वक शब्दों में कहने लगता है, “यही मेरे है मार्ग की बाधा l” बनवीर के क्रूर कांड और पन्ना के अपूर्व त्याग के साथ एकांकी समाप्त होती है l


               एकांकी कर ने पन्ना के चरित्र में यह व्यक्त किया है की राष्ट्रिय हित के लिए व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हित का बलिदान करना पड़ता है l त्याग से मनुष्य महान और स्वार्थलिप्सा से नीच बन जाता है l     

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