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Monday, 26 November 2018

बापू के प्रति / सुमित्रानंदन पंत

बापू के प्रति / सुमित्रानंदन पंत 

बापू के प्रति / सुमित्रानंदन पंत
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तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन हे अस्थिशेष तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुराण हे चिर नवीन l
तुम पूर्ण ईकाई जीवन की, जिसमें असार भव शून्य लीन,
आधार अमर होगी जिसपर, भावी की संस्कृति समासीन l


तुम मांस, तुम्ही हो रक्त अस्थि निर्मित जिनसे नवयुग का तन
तुम धन्य, तुम्हारा नि:स्व त्याग है विश्व भोग का वर साधन ;
इस भस्म काम तन की रज से जग पूर्ण काम नव जगजीवन,
बीनेगा  सत्य – अहिंसा   के   ताने – बानों  से  मानवपन l     
                      

सुख भोग खोजने आते सब, आए तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम आत्मा के मन के मनोज l
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर , चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया, तुमने मानवता का सरोज l


पशु बल की कारा से जग को दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,
विद्वेष घृणा से लड़ने को सिखलाई दुर्जय प्रेम – युक्ति,
वर श्रम प्रसूति से की कृतार्थ, तुमने विचार परिणीति उक्ति,
विश्वानुरक्त  हे  अनासक्त, सर्वस्य त्याग को बना मुक्ति l


उर के चरखे में कात सुक्ष्म युग युग का विषय जनित विषाद,                                    गुंजित कर दिया गगन जग का, भर तुमने आत्मा का निषाद                                     रंग - रंग खद्दर के सूत्रों में,  नव जीवन आशा, स्पृहाह्लाद, 
मानवी कला के सूत्रधार, हर लिया यन्त्र कौशल प्रवाद l

साम्राज्यवाद था कंस, बंदिनी, मानवता, पशु – बलाक्रान्त,
श्रृंखला – दासता, प्रहरी बहु, निर्मम शासन पद शक्ति भ्रांत l 
कारागृह में डे दिव्य जन्म, मानव आत्मा को मुक्त, कान्त,  
जन शोषण की बढ़ती यमुना तुमने की नत, पद प्रणत शांत l

कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति बहु धर्म जाति गति रूप नाम,
बंदी जग जीवन, भू विभक्त, विज्ञान मूढ़, जन प्रकृति – काम;
आए तुम मुक्त पुरुष, कहने – मिथ्या जड़ बंधन, सत्य राम,
नानृत जयति सत्यम मा भै, जय ज्ञान ज्योति तुमको प्रणाम l

                                       ( ‘युगान्त से’ )  
                                                                                                                                           

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