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Monday, 26 November 2018

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मैंने आहुति बन कर देखा 


मैंने आहुति बन कर देखा / सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
https://www.hindisahitya.info

मै कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने ,   
मैं कब कहता हूँ जीवन मरू नंदन कानन का फूल बने ?
कांटा  कठोर है, तीखा है, उसमें उस की मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने l




मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?
मैं कब कहता हूँ विजय  करू  मेरा  ऊँचा  प्रसाद  बने ?
या पत्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली - सी याद बने ?




पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ?
नेतृत्व न मेरा छीन जावे क्यों इस की हो परवाह मुझे ?
मैं  प्रस्तुत  हूँ  चाहे  मिट्टी  जनपद  की  धुल  बने l
फिर उस धूली का कण कण भी मेरा गति रोधक शूल बने l




अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है -----
क्या वह केवल अवसाद - मलिन झरते आंसू की माला है ?
वे  रोगी  होंगे  प्रेम जिन्हें अनुभव रस का कटु प्याला है
वे  मुर्दे  होंगे  प्रेम  जिन्हें  सम्मोहनकारी  हाला  है l




मैंने विदग्ध हो जान लिया, अंतिम रहस्य पहचान लिया ---
मैंने आहुति बनकर देखा,  यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है l
मैं कहता हूँ मैं बढ़ता हूँ,  मैं नभ की छोटी चढ़ता हूँ
कुचला जाकर भी धूली सा, आँधी सा और उमड़ता हूँ l




मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि - धार बने
इस निर्मम रण में पग पग का रुकना ही मेरा वार बने l
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने ---
तेरी पुकार सा दुर्निवार,  मेरा यह नीरव प्यार बने l  

                                     ( ‘पूर्वा’ से )                                                         

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