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Monday, 10 December 2018

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 गिल्लू / महादेवी वर्मा 

गिल्लू / महादेवी वर्मा
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      सोनजुही में आज एक पीली कलि लगी है l उसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण आया, जो इस लता कि सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था l तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राणी की खोज है l
     
     परन्तु वह तो अब तक सोनजुही की जड़ में मिट्टी होकर मिल गया होगा कौन जाने स्वर्णिम कली के बहाने वही मुझे चौंकाने ऊपर आ गया हो l
     
     अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छुवा – छुवौवल जैसा खेल रहे हैं l यह कागभुशुण्डी भी विचित्र पक्षी है – एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित l
    
     हमारे बेचारे पुरखे न गरुण के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के न हंस के l उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है l इतना ही नहीं, हमारे दूरस्थ प्रियजनों को भी अपने आने का मधु सन्देश इनके कर्कस स्वर ही में देना पड़ता है l दूसरी ओर हम कौवा और काँव काँव करने को अवमानना के अर्थ में ही प्रयुक्त करते हैं l

     मेरे काक्पुरण के विवेचन में अचानक बाधा आ पड़ी, क्योंकि गमले और दीवार की सन्धि में छिपे एक छोटे से जीव पर मेरी दृष्टि रूक गई l निकट जाकर देखा, गिलहरी का छोटा बच्चा है, जो संभवतः घोसले से गिर पड़ा है और अब कौवे जिसमे सुलभ आहार खोज रहे है l
   
     काकद्वय की चोंचों के दो घाव उस लघु प्राण के लिए बहुत थे l अतः वह निश्चेष्ट सा गमले में चिपटा पड़ा था l सबने कहा की कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद वह बच नहीं सकता, अतः इसे ऐसे ही रहने दिया जाए l परन्तु मन नहीं माना, उसे हौले से उठाकर अपने कमरे में ले आई, फिर रुई से रक्त पोंछकर घांवों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया l
     
     रुई की पतली बत्ती दूध में भिगोकर जैसे तैसे उसके नन्हे से मुँह में लगाई, पर मुँह खुल न सका और दूध की बूंदे दोनों ओर लुढ़क गई l

     कई घंटे के उपचार के उपरांत उसके मुंह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका l तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त हो गया की मेरी उंगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर, नीले कांच की मोतियों जैसी आँखों से इधर उधर देखने लगा l

     तीन चार माह में उसके स्निग्ध रोएँ, झब्बेदार पूंछ और चंचल चमकीली आँखे सबकी विस्मित करने लगी l

     हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे l मैंने फूल रखने की एक हल्की डलिया में रुई बिछाकर उसे तार से खिड़की पर लटका दिया l

   वही दो वर्ष गिल्लू का घर रहा l वह स्वयं हिलाकर अपने घर में झूलता और अपने कांच के मनकों सी आँखों से कमरे के भीतर और खिड़की से बाहर न जाने क्या देखता समझता रहता था, परन्तु उसकी समझदारी और कार्यकलाप पर सबको आश्चर्य होता था l
     
     जब मैं लिखने बैठती तब अपनी ओर मेरा ध्यान आकर्षित करने की उसे इतनी तीव्र इच्छा होती थी की उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला l

     वह मेरे पैर से आकर सर्र से परदे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेजी से उतरता l उसका यह दौड़ने का क्रम तब तक चलता, जब तक मैं उसे पकड़ने के लिए न उठती l

     कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लम्बे लिफाफे में इस प्रकार रख देती की अगले दो पंजों और सर के अतिरिक्त सारा लघु गात लिफाफे के अन्दर बंद रहता l इस अदभुत स्थिति में कभी कभी घण्टों मेज पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्यकलाप देखा करता l

     भूख लगने पर चिक चिक करके वह मुझे सूचना देता और काजू या बिस्कुट मिल जाने पर उसी स्थिति में लिफेफे से बाहर वाले पंजों से उसे कुतरता रहता l

     फिर गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया l नीम चमेली की गंध मेरे कमरे में हौले हौले आने लगी l बाहर गिलहरियाँ खिड़की की जाली के पास आकर चिक चिक करके न जाने क्या कहने लगी l

     गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झांकते देखकर मुझे लगा की इसे मुक्त करना आवश्यक है l

     मैंने कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मार्ग गिल्लू ने बाहर जाने पर सचमुच मुक्ती की सांस ली l इतने छोटे जीव को घर में पले कुत्ते और बिल्लियों से बचाना भी एक समस्या ही थी l

     आवश्यक कागज पत्रों के कारण बाहर जाने पर मेरा कमरा बंद ही रहता है l मेरे कालेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने भीतर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू जाली के द्वार से भीतर आकर मेरे पैर से सर और सर से पैर दौड़ लगाता l तब से यह नित्य का क्रम हो गया l

    मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी खिड़की की खुली जाली की राह बाहर चला जाता और दिन भर गिलहरियों के झुण्ड का नेता बना, हर दाल पर उछलता कूदता रहता और ठीक चार बजे वह खिड़की से भीतर आकार अपने झूले पर झूलने लगता l

    मुझे चौकाने की इच्छा उसमे न जाने कब और कैसे उत्पन्न हो गई थी l कभी फूलदान के फूलों में छिप जाता, कभी परदे की चुन्नट में और कभी सोनजुही की पत्तियों में l

     मेरे पास बहुत से पशु पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परन्तु उसमे से किसी को मेरे साथ मेरे थाली में खाने की हिम्मत हुई हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता l

     गिल्लु इसमे अपवाद था l मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँची, वह खिड़की से निकलकर आँगन के दीवार, बरामदा पार करके मेज पर पहुँच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता l बड़ी कठिनाई से उसे मैंने थाली के पास बैठना सिखाया, जहाँ बैठकर वह मेरी थाली में से एक एक चावल उठाकर बड़ी सफाई से खाता रहता l काजू उसका प्रिय खाद्य था और कई दिन काजू न मिलने पर वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता या तो झूले के निचे फेंक देता था l

     उसी बीच मुझे मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहन पड़ता l उन दिनों जब मेरे कमरे का दरवाजा खोला जाता, गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता और फिर किसी दूसरे को देखकर उसी तेजी से अपने घोसले में जा बैठता सब उसे काजू दे जाते, परन्तु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सफाई की तो उसमे काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात हुआ की वह उन दिनों अपना प्रिय खाद्य कम खाता था l

     मेरी अस्वस्थता में वह तकिये पर सिराहने बैठकर अपने नन्हे नन्हे पंजों से ये मेरे सर और बालों को इतने हौले हौले सहलाता की उसका हटना एक परिचारिका के हटने के समान था l

     गर्मियों में जब दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता, न अपने झूले में बैठता l उसने मेरे निकट रहने के साथ गर्मी से बचने का एक सर्वथा नया उपाय खोज निकाला था l वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार समीप भी रहता और ठण्डक में भी रहता l

     गिलहरियों के जीवन की अवधी दो वर्ष से अधिक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन के यात्रा का अंत आ ही चुका था l दिनभर उसने ने कुछ खाया और न ही बाहर गया l रात में अन्त की यातना में भी वह झूले से उतारकर मेरे बिस्तर पर आया और ठन्डे पंजों से मेरी वही ऊँगली पकड़कर हाँथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था l

     पंजे इतने ठन्डे हो रहे थे की मैंने जागकर हीटर जलाया और उसे उष्णता देने का प्रयत्न किया, परन्तु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया l  

     उसका झूला उतारकर रख दिया है और खिड़की की जाली बंद कर दी गई है, परन्तु गिलहरियों की नई पीढ़ी जाली के उस पार चिक चिक करती ही रहती है और सोनजुही पर बसंत आता ही रहता है l

     सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गई – इसलिए भी की उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी – इसलिए भी की लाघुपात का, किसी वासंती दिन, जूही के पिलाभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास मुझे सन्तोष देता है l           

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