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Monday, 3 December 2018

पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी


पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी





चाह नहीं, मै सुरबाला के गहनों में गुंथा जाऊं,

चाह नहीं प्रेमी माला में विंध प्यारी को ललचाऊं,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि ! डाला जाऊं

चाह नहीं देवो के सिर पर चढूं भाग्य को इठलाऊँ,


मुझे तोड़ लेना बनमाली

उस पथ पर देना तुम फेंक l

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने,

जिस पथ जावें वीर अनेक l

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