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Wednesday, 5 December 2018

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                                   ममता / जयशंकर प्रसाद

ममता / जयशंकर प्रसाद
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  रोहतास – दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गंभीर प्रवाह को देख रही है l ममता विधवा थी l उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था l मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए, वह सुख के कंटक शयन में विकल थी l वह रोहतास दुर्गापति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असम्भव था परन्तु वह विधवा थी – हिन्दू विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है l तब उसकी विडम्बना का क्या अंत है ?

   चूड़ामणि में चुपचाप उसके प्रकोष्ठ में प्रवेश किया l शोण के प्रवाह में, उसके कल नाद में, अपना जीवन मिलाने में वह बेसुध थी l पिता का आना न जान सकी l चूड़ामणि व्यथित हो उठे l स्नेह – पालिता पुत्री के लिए क्या करे, यह स्थिर न कर सकते थे l लौटकर बाहर चले गए l ऐसा प्रायः होता, पर आज मंत्री के मन में बड़ी दुश्चिंता थी l पैर सीधे न पड़ते थे l

   एक पहर बीत जाने पर वे फिर ममता के पास आए l उस समय उनके पीछे दस सेवक चांदी के बड़े थालों में कुछ लिए खड़े थे l कितने की मनुष्यों के पद शब्द सुन ममता ने घूमकर देखा l मंत्री ने सब थालों को रखने का सन्देश किया l अनुचर थल रखकर चले गए l

   ममता ने पूछा – “यह क्या है, पिताजी ?”

   “तेरे लिए बेटी ! उपहार है l कहकर चूड़ामणि ने उसका आवरण पलट दिया l स्वर्ण का पीलापन उस सुनहली संध्या में विकीर्ण होने लगा l ममता चौंक उठी –

   “इतना स्वर्ण ! यह कहाँ से आया ?”

   “चुप रहो ममता, यह तुम्हारे लिए है l”

   “तो क्या आपने म्लेच्छ का उत्कोच स्वीकार कर लिया ? पिताजी ! यह अनर्थ है, अर्थ नहीं, लौटा दीजिए l पिताजी ! हम लीग ब्राह्मण हैं, इतना सोना लेकर क्या करेंगे ?”

   “इस पतनोन्मुख प्राचीन सामन्त वंश का अन्त समीप है बेटी ! किसी भी दिन शेरशाह रोहिताश्व पर हमला कर सकता है l उस दिन मंत्रित्व न रहेगा बेटी, तब के लिए बेटी l“

  “हे भगवान ! तब के लिए ! विपद के लिए ! इतना आयोजन ! परमपिता के विरुध्द इतना साहस ! पिताजी, क्या भीख न मिलेगी ? क्या कोई हिन्दू भू पृष्ठ पर न बचा रह जाएगा, जो ब्राह्मण को दो मुठ्ठी अन्न दे सके ? यह असम्भव है l फेर दीजिए पिताजी, मैं काँप रही हूँ – इसकी चमक आँखों को अंधा बन रही है l”

   “मुर्ख है l” – कहकर चूड़ामणि चले गए l

पढ़िए पन्नाधाय के महान बलिदान की कहानी दीपदान / डॉ रामकुमार वर्मा


  दूसरे दिन जब डोलियों का तांता भीतर आ रहा था, ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि का ह्रदय धक धक करने लगा l वह अपने को रोक न सका l उसने जाकर रोहिताश्व दुर्ग के तोरण पर डोलियों का आवरण खुलवाना चाहा l पठानों ने कहा ----

   “यह महिलाओं का अपमान करना है l”

  बात बढ़ गई l तलवारें खिंची, ब्राह्मण वहीँ मारा गया और राजा रानी और कोष छली शेरशाह के हाँथ पड़े, निकल गई ममता l डोली में भरे हुए पठान सैनिक दुर्ग भर में फैल गए पर ममता न मिली l

  काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खण्डहर था l भग्न चूड़ा, तृण गुल्मों से ढके हुए प्राचीर, ईंटों के ढेर में बिखरी हुई भारतीय विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी l

   जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए मिले थे, उसी स्तूप के भग्नावशेष की मलिन छाया में एक झोपड़ी के दीपलोक में एक स्त्री पाठ कर रही थी ---

   “अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते l”

   पाठ रूक गया l एक भीषण और हताश आकृति दीप के मंद प्रकाश में सामने खड़ी थी l स्त्री उठी, उसने कपाट बंद करना चाहा l परन्तु उस व्यक्ति ने कहा –- “माता ! मुझे आश्रय चाहिए !”

   “तुम कौन हो ?” – स्त्री ने पूछा l

   “मैं मुग़ल हूँ l चौसा युद्ध में शेरशाह से विपन्न होकर रक्षा चाहता हूँ l इस रात अब आगे चलने में असमर्थ हूँ l”

   “क्या शेरशाह से !” स्त्री ने अपने होंठ काट लिए l

   “हाँ, माता !”

   “परन्तु तुम भी वैसे ही क्रूर हो, वही भीषण रक्त की प्यास, वही निष्ठुर प्रतिबिम्ब, तुम्हारे मुख पर भी है l सैनिक ! मेरी कुटी में स्थान नहीं, जाओ कहीं दूसरा आश्रय खोज लो !”

   “गला सूख रहा है, साथी छूट गए है, अश्व गिर पड़ा है – इतना !” – कहते कहते वह वह व्यक्ति धम्म से बैठ गया और उसके सामने ब्रह्माण्ड घूमने लगा l स्त्री ने सोचा, यह विपत्ति कहाँ से आयी ! उसने जल दिया, मुग़ल के प्राणों की रक्षा हुई l वह सोंचने लगी – “सब विधर्मी दया के पात्र नही – मेरे पिता का वध करने वाले आततायी !” घृणा से उसका मन विरक्त हो गया l

   स्वस्थ होकर मुग़ल ने कहा – “माता तो मैं चला जाऊं ?” फिर विचार कर रही थी – “मैं ब्राम्हणी हूँ, मुझे तो अपने धर्म – अतिथि देव की उपासना का पालन करना चाहिए l परन्तु यहाँ ......नहीं – नहीं, सब विधर्मी दया के पात्र नहीं l परन्तु यह दया तो नहीं .......कर्तव्य करना है l तब ?”

  मुग़ल अपनी तलवार टेककर उठ खड़ा हुआ l ममता ने कहा – “क्या आश्चर्य है की तुम भी छल करो; ठहरो l”

“छल ! नहीं, तब नहीं स्त्री ! जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा ? जाता हूँ l भाग्य का खेल है l”

   ममता ने मन में कहा – “यहाँ कौन दुर्ग है ? यही झोपड़ी न, जो चाहे ले ले, मुझे अपना कर्तव्य करना पड़ेगा l” वह बाहर चली आई और मुग़ल से बोली – “ जाओ भीतर, थके हुए भयभीत पथिक ! तुम चाहे कोई हो, मैं तुम्हे आश्रय देती हूँ l मैं ब्राह्मण कुंवारी हूँ, सब अपना धर्म छोड़ दे, तो मैं भी छोड़ दूँ ?” मुग़ल ने चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में वह महिमामय मुखमंडल देखा, उसने मन ही मन नमस्कार किया l ममता पास की टूटी हुई दीवार में चली गई l भीतर, थके पथिक झोपड़ी में आराम कियां l

  प्रभात में खण्डहर की सन्धि से ममता ने देखा, सैकड़ों अश्वारोही उस प्रान्त में घूम रहे हैं l वह अपनी मूर्खता पर अपने को कोसने लगी l

   अब उस झोपड़ी से निकलकर उस पथिक ने कहा – “मिरजा ! मैं यहाँ हूँ l

   शब्द सुनते ही प्रसन्नता की चीत्कार ध्वनि से वह प्रान्त गूँज उठा l ममता अधिक भयभीत हुई l पथिक ने कहा – “वह स्त्री कहाँ है ? उसे खोज निकालो l” ममता छिपने के लिए अधिक सचेष्ट हुई l वह मृग दाव में चली गई l दिन भर उसमें से न निकली l संध्या में जब उन लोगों के जाने का उपक्रम हुआ, तो ममता ने सुना, पथिक घोड़े पर सवार होते हुएकह रहा है – “मिरजा ! उस स्त्री को मैं कुछ दे न सका l उसका घर बनवा देना; क्योंकि मैंने विपत्ति में यहाँ विश्राम पाया था l यह स्थान भूलना मत l” इसके बाद वे चले गए l

   चौसा के मुग़ल पठान युद्ध को बहुत दिन बीत गए l ममता अब सत्तर वर्ष की वृद्धा है l वह अपनी झोपड़ी में एक दिन पड़ी थी l शीतकाल का प्रभात था l उसका जीर्ण कंकाल खाँसी से गूँज रहा था l ममता की सेवा के लिए गाँव की दो तीन स्त्रियाँ उसे घेर कर बैठी हुई थी; क्योंकि वह आजीवन सबके सुख दुःख की सहभागिनी रही l

   ममता ने जल पीना चाहा, एक स्त्री ने सीपी से जल पिलाया l सहसा एक अश्वारोही उसी झोपड़ी के द्वार पर दिखाई पड़ा l वह अपनी धुन में कहने लगा – “मिरजा ने जो चित्र बनाकर दिया है, वह तो इस जगह का होना चाहिए l वह बुढ़िया मर गई होगी, अब किससे पूछू की एक दिन शहंशाह हुमांयू किस छप्पर के नीचे बैठे थे ? यह घटना भी तो सैंतालिस वर्ष से ऊपर की हुई l”

   ममता ने अपने कानों से सुना l उसने पास की स्त्री से कहा – ‘उसे बुलाओ l’

  अश्वारोही पास आयाl ममता ने रुकरुक कर कहा “मैं नहीं जानती वह शहंशाह था या असाधारण मुग़ल पर एक दिन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा l मैंने सुना था की वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चूका था l मैं आजीवन अपनी झोपड़ी खुदवाने के डर से भयभीत रही l भगवान ने सुन लिया, मै आज इसे छोड़े जाती हूँ l अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर विश्राम गृह में जाती हूँ l”

   वह अश्वारोही अवाक् खड़ा था l बुढ़िया के प्राण पक्षी अनंत में उड़ गए l

वहाँ एक अष्टकोण मंदिर बना, और उस पर शिलालेख लगाया गया –

   “सातों देश के नरेश हुमांयु ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था l उसके पुत्र अकबर ने उसकी स्मृति में यह गगनचुम्बी मंदिर बनवाया है l”

   पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं l      


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